Friday, 22 November 2013

लक्ष्य है स्वीकार कहना पड़ेगा

चल रहा पंथी गगन में गीत गाता
शून्य-सा नभ में भ्रमता-भ्रमाता
सांस चलती है पथिक चलना पड़ेगा
अब हार पर जीत का परचम उड़ेगा, लक्ष्य है स्वीकार कहना पड़ेगा

देख तेरी इस मायूसी को
सूर्य ने चमकना भुलाया
नभ-चंद्र ने हँसना भुलाया
और भूली चांदनी भी खुद सजाना
मत बना पथिक इन्हें बैठ जाने का बहाना...
जीवन नदी है इसे बस बहना पड़ेगा, लक्ष्य है स्वीकार कहना पड़ेगा

ये तो बस काले बादल का साया
मत ओढ़ पथिक तम की ये माया
डग डग डग-सा चलता चल
जैसे कल कल-सा बहता जल
कुछ दूर खड़ी बस तेरी छाया
अब तू गगन में ही उड़ेगा, लक्ष्य है स्वीकार कहना पड़ेगा

हाँ सुना कभी, ‘ईश्वर कण-कण है’
पर मेरा मंदिर मेरा प्रण है
जीना भी क्या कोई रण है ?
पर रण में जीना ही तो प्रण है
हर मंच पे नवरंग के तू रंग भरेगा, लक्ष्य है स्वीकार कहना पड़ेगा..... लक्ष्य है स्वीकार कहना पड़ेगा

Friday, 15 November 2013

है सूना घरौंदा की बिटिया नहीं है


ये खिलौना है तेरा, ये बिछौना है तेरा
तू नव्या उजेरा, ये बसेरा है तेरा
है सूना घरौंदा की बिटिया नहीं है
है दूना बस रोना की बिटिया नहीं हैं 

तेरा मुस्कुराना, वो रोना फिर हँसना
हँस के, सुबक के, गले मिल के कहना
गुड़िया फिर ला दो ओ पापा तुम प्यारे
नन्ही परी मैं कहते हैं सारे 

दौलत तू ही है, तू है मेरा सृजन
तन - मन तू ही है, तू है मेरा दर्पण
तू नन्ही सी मूरत, शुभ है महूरत
है मासूम देवी, मैं तुझ पर हूँ अर्पण

 ये झूला है तेरा, जो भूला पड़ा है
नहीं आज खाना ये चूल्हा पड़ा है
तेरी फ्रोक पीली, इन नजरों से गीली
तू जल्दी से आ जा की पापा खड़ा है
तू जल्दी से आ जा की पापा खड़ा है

Wednesday, 13 November 2013

मैंने सुना है तुम कल आओगी....


पुरानी किताब और गुलाब की सूखी पंखुरियाँ
मोर पंख में चिपकी मानों हर रंग की परीयाँ
मैंने धीरे से उन्हें सहलाया, थोड़ा पुचकारा
मंद मंद मुस्काके, आँखों के पानी से नहलाया
बोलो कभी तुम भी अपने सिरहाने रखी मेरी तस्वीर में नजरों को बोओगी
भला कब तक सूरज को बंद आँखों से देखोगी...मैंने सुना है तुम कल आओगी.....

 याद है वो कॉलेज का गलीचा
याद है वो आम का बगीचा
हाँ याद है वो नदी का किनारा
याद है वो मिलन का सवेरा
भला कब तक विरह बेला सजाओगी..... मैंने सुना है तुम कल आओगी.....

 कल आईं थी फिर तुम याद की चौखट पे
हाँ उसी पहाड़ी, उसी पेड़ की छाँव और गाँव की पनघट पे
मैंने सितारों को भी रोक रखा था तुम्हारे स्वागत में
पर तुम चुपके से छू के चली गई प्यार की बनावट में
भला कब तक मेरी छुअन को ना धोओगी.... मैंने सुना है तुम कल आओगी.....

Saturday, 12 October 2013

सचिन तेंदुलकर


शाम हो गयी दूर हुआ वो, बनके एक सितारा
खेल जगत का राजा है वो, प्यारा सचिन हमारा  

तुम बिन टीम तो आधी है
और 'blue jersey'  भी सादी है  

हो तुम गौरव, Cricket की भाषा
तुम Cricket देखने की अभिलाषा  

तुम बिन सूनी Cricket की गरिमा
तुम बिन आधी हर Shot की महिमा  

हर Shot किताबी लगते थे
क्या आसानी से खेले थे
Warne
के सपनों में छाए
क्या कादिर-वकार को पेले थे  

शत-शत नमन शतकों को तेरे
'
दो सौ' को सादर नमन
नमन करें बल्ले को तेरे, नमन गुरु अचरेकर को
नमन करें उस 'मात-पिता' को - जिसने पाला तेंदुलकर को
तेरे कौशल को नमन, तेरे शतकों की माला से
'
आशीष' यूं ही ईश्वर का बरसे, तू दूर रहे हर व्याधा से
.......तू दूर रहे हर व्याधा से

Wednesday, 28 August 2013

राधे राधे बोलो चले आयेंगे बिहारी


राधे राधे बोलो चले आयेंगे बिहारी
देश को बचाने चले आयेंगे मुरारी
आधी रात को तुम जन्मे और मेरा देश भी
चीरहरण होते रोज पर तेरा दोष नहीं

एक कंस तूने मारा, कई कंस घुमते हैं
वंशवाद polictics में सारे नेता झूमते हैं
Currency की-कदर नहीं, बे-अदब ये व्यवस्था है
Urgency में बदहाल पड़ी, रोती अर्थव्यवस्था है 

है ये चिदम्बरम की चौधराहट और मन्नू की बिमारी
Current account deficit और खाली अलमारी
राधे राधे बोलो चले आयेंगे बिहारी
देश को बचाने चले आयेंगे मुरारी

Wednesday, 21 August 2013

मैं बहिन हूँ मंहगाई, जिसका भाई भ्रष्टाचार

मैं बहिन हूँ मंहगाई, जिसका भाई भ्रष्टाचार
राखी का बंधन ना टूटे, खूब फले ये अपना प्यार
 
डायन डायन कहते मुझको,
पर देख कितनी मैं भोली हूँ,
हूँ काले धन-सी काली,
पर तेरे हाथों की राखी और माथे की रोली हूँ
 
डॉलर भैया भी आये हे
पैंसठ की राखी लाये थे
कह रहे हे की जल्दी बाँध
अब जाना है सत्तर पार
ओ प्यारे भैया भ्रष्टाचार.... ओ प्यारे भैया भ्रष्टाचार
 
मैं सूर्पनखा तू भैया रावण
दे वचन आज है शुभ दिन पावन
विकास-दर को रंगहीन कर
खुशियाँ भरना मेरे दामन
 
मैं Onion की Gold परत
तू नेताओं का भाई भरत
2G’ को आदर्श बना के और ‘Common Wealth’ को धर अलमारी
तू ही हर्षद, तेलगी और तू ही कांग्रेसी कलमाड़ी
कुछ ना मुश्कल तेरे खातिर, और नेता कितने तेरे यार
ओ प्यारे भैया भ्रष्टाचार.... ओ प्यारे भैया भ्रष्टाचार

Wednesday, 26 June 2013

प्रकृति मानव से (केदारनाथ त्रासदी के सन्दर्भ में)


प्रकृति मानव से
मैं हूँ शिव, मैं हूँ केदार
है देवभूमि, मत कर प्रतीकार
यह मानसरोवर ज्योति-पुंज
दिनकर भी करते इनका बखान
है दिव्यलोक, आलोक यहाँ
उज्जवल शिखर परलोक यहाँ
स्वरुप है मेरा श्वेताम्बर
कहीं हरियाली में नीला अम्बर 

पर हे मानव क्या हुआ विचार?
जब करी प्रकृति से छेड़छाड़
प्रगति के चाहत में तूने
कण-कण कर डाला मुझको लाचार

मानव प्रकृति से
हे प्रकृति क्या मेरा दोष
मुझपर क्यूँ करते आक्रोश
मैं तो शिव को पाने पहुँचा
कष्ट-निवारण कारण पहुँचा
पर तूने तो भक्तों को त्राषा
लाचार पड़े हैं बूढ़े-बच्चे,
ये भी भूखा, ये भी प्यासा 

तेरे प्रांगण विध्वंश की लीला
अब शिव लिंग मानो शव का है टीला
नमः शिवाय भी काम ना आई
क्या शिव को कुछ लाज ना आई 

शिव मानव से
हाँ हाँ विछिप्त हूँ मैं भी मानव
पर रोक ना पाया शिव का तांडव
मेरे हैं जंगल, ये पर्वत, और मेरी है प्रकृति
मानो बस मैं ही मैं हूँ, और ये मेरी हैं आकृति
इससे तनिक भी भेदवाव, जो करे मनुज और बने स्वार्थी
मेरे प्रकोप का भोगी वो, फिर स्वयं की खींचे है वो अर्थी 

ये जीवन तो बस मार्ग है मानो
मुझतक खुद को लाने का
चिर निश्चित है मृत्यू सब की
फिर क्यूँ चिंता करता है कल की
मृत्यू को बस मित्र बना ले
मन निश्छल कर खुद को पा ले
बिन मृत्यू तो जीवन ना रे
ना तू समझे सुख का स्वाद
ना नाते रिश्ते, ना जीवन-यापन
जीवन बन जाए बोझ-विषाद 

कर अथक प्रयास, सदकाम में जी ले
बन सत्य पथिक, और गंगा पी ले
जो दूर भगा दे, मैं कपटी दानव
फिर मैं ही हूँ तुझमे हे मानव
तुझमें है बद्री, तुझमें ही बसता केदार
फिर तू ही शिव है, हर प्रकार
फिर तू ही शिव है, हर प्रकार