Saturday, 7 December 2013

माँ (दोहे)....


माँ बसती रग-रग में, माँ ममता का सागर|
ले आ चाहे जितनी भर ले, अपने मन की गागर||

स्नेह भरी वो गंगा है, बिन उसके जीवन बेकार|
माँ ममता की सरिता है, निर्मल एक बयार||

चाहे मिलें हज़ार से, मिला ना माँ-सा अपनापन|
माँ का अदभुत प्रेम है, निश्छल जल-सा मन||

ईश्वर अल्लाह पूज के, पंडित भए संसार|
जो ना पूजा मात को, ये सब हैं बेकार||

माँ तो मेरा मूल है, माँ बिन एक ना आधा|
तू जो मेरे संग रहे, दूर रहे हर व्याधा||

हर कष्टों से दूर है रखा, पाला अपना लाल|
पल भर को भी समय निकाल, पूछ ले माँ का हाल||

लड़खड़ाए जब भी, खुद ही संभल गए

लड़खड़ाए जब भी, खुद ही संभल गए
कर याद रोए जब भी, खुद ही बहल गए
यूँ इंतज़ार में बरसों निकल रहे
मौसम बदल रहा, क्यूँ न तुम बदल गए 

है तस्वीर आपकी जो सामने यहाँ
ना दूर जाईये, दिल थामिये यहाँ
हैं संग रंग सारे मिजाज़ आपके
गज़ल लब्ज़ मेरे लब के गाईए यहाँ

इन निगाहों में मैं बस डूबता जाऊं
जिंदगी भूलता जाऊं, इशारे मानता जाऊं
है कुछ दिनों की जिंदगी
मैं गीत गाता जाऊं, मैं गुनगुनाता जाऊं

Tuesday, 3 December 2013

सुनो जरा कुछ कहता है घर, गुमसुम है पर कहता है घर

सुनो जरा कुछ कहता है घर, गुमसुम है पर कहता है घर
बंद पड़े इस खाली मकान में, बोलो कोई रहता है घर ?
सुबह हुई सूरज है आया
और शाम हुई सूरज था आया
दिन-भर खामोश रहा हूँ मैं
चुपचाप यहीं पड़ा हूँ मैं
मेरे संग ये खिड़की बेचारी
भिड्की थी या बंद बेचारी
उसके ऊपर का आला
और दरवाज़े का ताला
मुझसे यूँ पूछें हैं सारे
अब आए हो जब आ गए तारे
दिन भर घर के बाहर रहा ढूँढता सपनों को
बोल कहाँ छोड़ आया अपनों को
सुनो जरा कुछ कहता है घर, गुमसुम है पर कहता है घर 

मैं चौखट हूँ परेशान
कोई ना आया कोई निशान
मैं तेरी प्रियसी का कमरा ना वो खुशबू, अंधियारा है दूना
उनकी उतरी बिंदी बिन देखो शीशा भी है सूना
और टेढ़ा-सा आँगन मुझको आँख दिखाए, डांटे बरबर
सुनो जरा कुछ कहता है घर, गुमसुम है पर कहता है घर 

प्यारी बिटिया की अलमारी, कहती है मुझसे लाचारी
कब आएगी तेरी लाडो, इन कपड़ो की राजकुमारी
खुद ही साइकल उसकी चलती, कहती है मुझको चल-चल के
नन्हे-से वो हाथ कहाँ हैं, कैसे गिर जाऊं साथ कहाँ है
खेल-खुलौने खुद ही हँसते, मुझको रोने भी ना देते
कहते हैं नव्या ले आओ, इतनी खामोशी सोने ना देते
तेरे पानी का थर्मस और छोटा अम्ब्रेला
पूछे है मुझसे, कब तक सूखा रहूँ अकेला
सुनो जरा कुछ कहता है घर, गुमसुम है पर कहता है घर 

Wednesday, 27 November 2013

मुझे एक दिन जाना, हूँ बिटिया किसी की

 
मुझे एक दिन जाना, हूँ बिटिया किसी की
वो बाबुल का आँगन, वो बाबुल की बगियाँ
क्यूँ छोड़ आई वो ममता की नदियाँ
मम्मी के आँचल में चुपके से छिपना
बहुत याद आवे वो छुप के निकलना
मैं रोई चिल्लाई और ये गलियां भी सिसकी
मुझे एक दिन जाना, हूँ बिटिया किसी की
 
वहीं छूटा बचपन, लड़कपन, शरारत
मैं आई पीया घर, कर खुद से बगावत
वो स्कूल जिसमें गई थी मैं पहले
वो रस्ते भी भूले जिसमें खूब टहले
सारी सहेली आईं विदा में
गले लग-लग रोई बस आंसू फिज़ा में
बहुत याद आता, भैया मुस्कुराता
वो दूज का टीका और रखिया उसी की
मुझे एक दिन जाना, हूँ बिटिया किसी की
मुझे एक दिन जाना, हूँ बिटिया किसी की

Tuesday, 26 November 2013

सखी जरा तुम आ जाना

सखी जरा तुम आ जाना पर आके फिर बस मत जाना
आँगन के सूखे फूलों में तुम थोड़ी सुगंध बसा जाना

सुनो जरा खामोश है मौसम, और दिशाएँ सोई हैं
मेरे संग चौखट पे सारी रात ये रोई हैं
इस दूरी को क्या मैं नापूं, मानों प्यास और पनघट है
मेरे संग बस खत वो तेरे, सूखे गुलाब और करवट हैं
सुबह हुई सूरज है आया और लाया उम्मीदों का ताना
सखी जरा तुम आ जाना पर आके फिर बस मत जाना
आँगन के सूखे फूलों में तुम थोड़ी सुगंध बसा जाना...

तुम मेरे शब्दों की मंसा, गीतों में समाई हो
तुम मेरी राधा – सी मूरत, मीरा की चौपाई हो
इन बादलों का रिमझिम टपकना, मेरी तड़प की भावना है
है ये सावन या फिर आंसू, बस तेरे महक की कल्पना है
चाँदनी भी उतर रही है और मैनें भी छोड़ा गीत गाना
सखी जरा तुम आ जाना पर आके फिर बस मत जाना
आँगन के सूखे फूलों में तुम थोड़ी सुगंध बसा जाना

Friday, 22 November 2013

क्या जिंदगी है आज ही या रुकेगी कल कहीं


क्या जिंदगी है आज ही या रुकेगी कल कहीं
तभी रुकेगी जिंदगी जब प्यार को हो पल नहीं
रुको नहीं चले चलो, झुको नहीं चले चलो
जो हार कि फटकार हो फिर जीत कि फसल वहीँ 

नया जोश होश हो, नई उमंग रोज हो
रोष भी समान हो, प्रेम में ही भोज हो
नहीं गिला किसी से अब और मौत से हो दोस्ती
नए बादलों तले नए शितिज कि खोज हो 

इंसान में प्यार से इंसानियत बनाइये
इंसानियत हो फलसफ़ा मजहब नया चलाईये
हो नदी में ज़ोर कितना, पतवार नई चाहिए
गर हों अँधेरे रास्ते बस लौ जलानी चाहिए.... बस लौ जलानी चाहिए

तुम्हारी याद आती है और मैं गुनगुनाता हूँ

तुम्हारी याद आती है और मैं गुनगुनाता हूँ
मुस्कुरा के शायद तुम्हें भुलाता हूँ
तुम मेरे पास हो यही सोच ना रोता हूँ, ना रुलाता हूँ
बस ये तस्वीर जानती है कैसे खुद को सुलाता हूँ

कुछ दर्द होते हैं जिनकी चुभन भी मीठी लगती है
साँस लेता हूँ की ये हवा आज भी महकती है
ऐ चाँद बंद कर अपनी चाँदनी
हमें तो अँधेरे में भी रौशनी लगती है