Sunday, 10 March 2013

माँ - यूं ही बैठा था और आँखें भर आई

यूं ही बैठा था और आँखें भर आई
माँ की याद दिल को छू आई
याद है वो खुशबू जो रसोई से आती थी
हाँ आज भी वो मुंह में पानी लाती है 

मुझे याद है वो दिन जब किसी बात पे खूब रोया था
माँ आई और आँचल से आंसुओं को पोछा
पर कई दिन बाद भी उस आँचल को ना धोया था 

जब भी परेशान-सा था, याद है उसकी पुचकार
वो नरम धूप-सा उसका आगोश, वो दुलार
गर आज भी परेशान होता हूँ तो खूब खलता है वो रुआब
माँ कहने की देरी है, और आ बैठती है मेरे ख्वाब
 
अब जब आ चुका हूँ एक नए संसार में
माँ नहीं है पास पूरे परिवार में
हाँ आज भी वो मीलों दूर मेरे लिये हलवा बनाती होगी
आज भी मेरे जिद को पापा से मनवाती होगी

 जाने क्यूँ आज मन उछल रहा है बचपन में जाने को, नादान से बनने को
फिर माँ के गोद से सिरहाना बनाऊंगा,
माँ तेरे लिये नई साडी लाऊंगा
पर जब सुनेगी तेरी याद में रो रहा हूँ मैं
झट से बोलेगी बसकर रोना,
जा रह ले खुद के संसार में
पर मेरी याद को ना खोना 

इन सितारों से सजे आसमान का रंग मुझे बेकार लगता है
माँ के आँचल के पीछे से झाकना आज भी बेकरार करता है
माँ एक बार फिर जो गोद में उठा ले तो आसमां छू लूं
माँ एक बार फिर जो गोद में उठा ले तो आसमां छू लूं

Monday, 31 December 2012

फिर साल ये पिछला हुआ और वर्ष नूतन आ गया

फिर साल ये पिछला हुआ और वर्ष नूतन आ गया
नई खुशियों को उगाने
और उसमे गीत गाने
नई आशा को पिरोने
और उसमे जीत बोने

देखो नया ये भोर है
चिंता नहीं ये डोर है
नव वर्ष की ये धूप है
जय भारती का शोर है
निश्चित गाने का अवसर है, वह साल भी गाता गया
फिर साल ये पिछला हुआ और वर्ष नूतन आ गया

Saturday, 29 December 2012

ऐ दिल्ली वालों तनिक डरो


ऐ दिल्ली वालों तनिक डरो
गर यमुना में पानी हो, धर चुल्लू में डूब मरो
काला-तेरा लाल किला है और खाकी वर्दी भी काली है
चीरहरण होते बस चौराहे पर, शर्म करो बस शर्म करो 

दुहसासन-सा बना प्रशाशन, और पुलिस-तंत्र हो गया निकम्मा
सफेद-पोश लाशो-से मंत्री, गद्दी पर है बूढी अम्मा
संविधान की कसमे खा कर, बस इटली का गुण-गान करो
अब संसद की दीवार ढहा दो, नुककड़ नाटक बंद करो ... नुककड़ नाटक बंद करो

Thursday, 20 December 2012

विवश-नारी

बहू बिन दहेज नहीं सुहाती मुझे
कोख की मासूमीयत नहीं रिझाती मुझे
हाँ बिल्कुल, बेटे की ज़िद पर, बेटी की इच्छा दबाता हूँ मैं
और पुरुष प्रधान समाज की वेदना भाती मुझे 

तेरी क्या मुझसे समता है
मैं भूल गया,  तू ही माँ की ममता है 

होगी तू बहन किसी की, होगी किसी भाई की पुचकार
भूल जाता हूँ बार-बार, अनसुनी करता करुणचीत्कार
मेरे लिए बस आज बस, तू एक नगर-वधु भर है
मानव हूँ, पर मानवता का करता प्रतिकार 

मैं तो मुग्ध होता हूँ तुझे पीड़ित कर के
हूँ इंसान पर इंसानियत को चकित कर के 

विडंबना है ये कि हूँ दुर्गा का पुजारी
पर खुश होता हूँ देख याचना करती विवश-नारी..... याचना करती विवश-नारी

Friday, 23 November 2012


दिन कुछ ऐसे गुजारता कोई
यादों के झरोखों से पुकारता कोई
आई थी तुम ये खुशबू बताती है
बस उस गुलाब की पंखुड़ी बुहारता कोई

Sunday, 28 October 2012

हाँ मैंने रावण को जलते देखा है
पर अभी अभी सौ रावण चलते देखा है
यूं ही ठंडी होती है आंच रावण की
क्या खुद में भी रावण बनते देखा है

Monday, 24 September 2012

पिता


बरसों बीत गए यूं चलते
हमको यूं मज़बूत बनाते
क्या धूप-छाँव, कब बरसा सावन
हमको बस करने को पावन
दिन-दिन यूं ही बीत गए
विद्यालय हमको पहुँचाते
घिसा अंगोछा, फटी बनियान
पर मेरा कुर्ता सिलवाते

हाँ, हाँ बिलकुल वो पिता हैं मेरे
मेरी किस्मत रचने वाले
अम्बर-सी छत बने रहे,
जब भी छाए बादल काले
जीवन सारा कटा भागते
मुझको नर्म बिछौना लाते
याद जरा तुम कर लो वो पल
जो पंखा झलते थे सिरहाने 

खाले-खाले एक और गिराई,
रोटी मीठी चटनी साथ
ठुमक-ठुमक चलना सिखलाया
थाम मेरे हाथों में हाथ
ठुमक-ठुमक चलना सिखलाया, थाम मेरे हाथों में हाथ..............