Wednesday, 26 June 2013

प्रकृति मानव से (केदारनाथ त्रासदी के सन्दर्भ में)


प्रकृति मानव से
मैं हूँ शिव, मैं हूँ केदार
है देवभूमि, मत कर प्रतीकार
यह मानसरोवर ज्योति-पुंज
दिनकर भी करते इनका बखान
है दिव्यलोक, आलोक यहाँ
उज्जवल शिखर परलोक यहाँ
स्वरुप है मेरा श्वेताम्बर
कहीं हरियाली में नीला अम्बर 

पर हे मानव क्या हुआ विचार?
जब करी प्रकृति से छेड़छाड़
प्रगति के चाहत में तूने
कण-कण कर डाला मुझको लाचार

मानव प्रकृति से
हे प्रकृति क्या मेरा दोष
मुझपर क्यूँ करते आक्रोश
मैं तो शिव को पाने पहुँचा
कष्ट-निवारण कारण पहुँचा
पर तूने तो भक्तों को त्राषा
लाचार पड़े हैं बूढ़े-बच्चे,
ये भी भूखा, ये भी प्यासा 

तेरे प्रांगण विध्वंश की लीला
अब शिव लिंग मानो शव का है टीला
नमः शिवाय भी काम ना आई
क्या शिव को कुछ लाज ना आई 

शिव मानव से
हाँ हाँ विछिप्त हूँ मैं भी मानव
पर रोक ना पाया शिव का तांडव
मेरे हैं जंगल, ये पर्वत, और मेरी है प्रकृति
मानो बस मैं ही मैं हूँ, और ये मेरी हैं आकृति
इससे तनिक भी भेदवाव, जो करे मनुज और बने स्वार्थी
मेरे प्रकोप का भोगी वो, फिर स्वयं की खींचे है वो अर्थी 

ये जीवन तो बस मार्ग है मानो
मुझतक खुद को लाने का
चिर निश्चित है मृत्यू सब की
फिर क्यूँ चिंता करता है कल की
मृत्यू को बस मित्र बना ले
मन निश्छल कर खुद को पा ले
बिन मृत्यू तो जीवन ना रे
ना तू समझे सुख का स्वाद
ना नाते रिश्ते, ना जीवन-यापन
जीवन बन जाए बोझ-विषाद 

कर अथक प्रयास, सदकाम में जी ले
बन सत्य पथिक, और गंगा पी ले
जो दूर भगा दे, मैं कपटी दानव
फिर मैं ही हूँ तुझमे हे मानव
तुझमें है बद्री, तुझमें ही बसता केदार
फिर तू ही शिव है, हर प्रकार
फिर तू ही शिव है, हर प्रकार





                  












Sunday, 10 March 2013

माँ - यूं ही बैठा था और आँखें भर आई

यूं ही बैठा था और आँखें भर आई
माँ की याद दिल को छू आई
याद है वो खुशबू जो रसोई से आती थी
हाँ आज भी वो मुंह में पानी लाती है 

मुझे याद है वो दिन जब किसी बात पे खूब रोया था
माँ आई और आँचल से आंसुओं को पोछा
पर कई दिन बाद भी उस आँचल को ना धोया था 

जब भी परेशान-सा था, याद है उसकी पुचकार
वो नरम धूप-सा उसका आगोश, वो दुलार
गर आज भी परेशान होता हूँ तो खूब खलता है वो रुआब
माँ कहने की देरी है, और आ बैठती है मेरे ख्वाब
 
अब जब आ चुका हूँ एक नए संसार में
माँ नहीं है पास पूरे परिवार में
हाँ आज भी वो मीलों दूर मेरे लिये हलवा बनाती होगी
आज भी मेरे जिद को पापा से मनवाती होगी

 जाने क्यूँ आज मन उछल रहा है बचपन में जाने को, नादान से बनने को
फिर माँ के गोद से सिरहाना बनाऊंगा,
माँ तेरे लिये नई साडी लाऊंगा
पर जब सुनेगी तेरी याद में रो रहा हूँ मैं
झट से बोलेगी बसकर रोना,
जा रह ले खुद के संसार में
पर मेरी याद को ना खोना 

इन सितारों से सजे आसमान का रंग मुझे बेकार लगता है
माँ के आँचल के पीछे से झाकना आज भी बेकरार करता है
माँ एक बार फिर जो गोद में उठा ले तो आसमां छू लूं
माँ एक बार फिर जो गोद में उठा ले तो आसमां छू लूं

Monday, 31 December 2012

फिर साल ये पिछला हुआ और वर्ष नूतन आ गया

फिर साल ये पिछला हुआ और वर्ष नूतन आ गया
नई खुशियों को उगाने
और उसमे गीत गाने
नई आशा को पिरोने
और उसमे जीत बोने

देखो नया ये भोर है
चिंता नहीं ये डोर है
नव वर्ष की ये धूप है
जय भारती का शोर है
निश्चित गाने का अवसर है, वह साल भी गाता गया
फिर साल ये पिछला हुआ और वर्ष नूतन आ गया

Saturday, 29 December 2012

ऐ दिल्ली वालों तनिक डरो


ऐ दिल्ली वालों तनिक डरो
गर यमुना में पानी हो, धर चुल्लू में डूब मरो
काला-तेरा लाल किला है और खाकी वर्दी भी काली है
चीरहरण होते बस चौराहे पर, शर्म करो बस शर्म करो 

दुहसासन-सा बना प्रशाशन, और पुलिस-तंत्र हो गया निकम्मा
सफेद-पोश लाशो-से मंत्री, गद्दी पर है बूढी अम्मा
संविधान की कसमे खा कर, बस इटली का गुण-गान करो
अब संसद की दीवार ढहा दो, नुककड़ नाटक बंद करो ... नुककड़ नाटक बंद करो

Thursday, 20 December 2012

विवश-नारी

बहू बिन दहेज नहीं सुहाती मुझे
कोख की मासूमीयत नहीं रिझाती मुझे
हाँ बिल्कुल, बेटे की ज़िद पर, बेटी की इच्छा दबाता हूँ मैं
और पुरुष प्रधान समाज की वेदना भाती मुझे 

तेरी क्या मुझसे समता है
मैं भूल गया,  तू ही माँ की ममता है 

होगी तू बहन किसी की, होगी किसी भाई की पुचकार
भूल जाता हूँ बार-बार, अनसुनी करता करुणचीत्कार
मेरे लिए बस आज बस, तू एक नगर-वधु भर है
मानव हूँ, पर मानवता का करता प्रतिकार 

मैं तो मुग्ध होता हूँ तुझे पीड़ित कर के
हूँ इंसान पर इंसानियत को चकित कर के 

विडंबना है ये कि हूँ दुर्गा का पुजारी
पर खुश होता हूँ देख याचना करती विवश-नारी..... याचना करती विवश-नारी

Friday, 23 November 2012


दिन कुछ ऐसे गुजारता कोई
यादों के झरोखों से पुकारता कोई
आई थी तुम ये खुशबू बताती है
बस उस गुलाब की पंखुड़ी बुहारता कोई

Sunday, 28 October 2012

हाँ मैंने रावण को जलते देखा है
पर अभी अभी सौ रावण चलते देखा है
यूं ही ठंडी होती है आंच रावण की
क्या खुद में भी रावण बनते देखा है